प्रतिबिम्ब. . . !

हर पहर शोख़ अदाओं से लबरेज़, उन तमाम बातों से बेहिस, पुराने रास्तों को छोड़ कर, अनजान बस्ती में खो जाने की कायल | मौलश्री की एक कली जैसी, पाँव में मानो अभिव्यक्ति की पाज़ेब बाँधी हो, और ज़बान पर… उतना ही अंकुश, हया तो मानो मुलाज़िमा हो उसकी, उसके हर हर्फ़ में बरक़त….कभी कविता पढ़ती, तो लगता जैसे फ़क़ीर की सुबह से सांझ होने को आई और अंततः उसे दिन की पहली बख़्शीश मिल ही गई |


उसकी आँखों के लश्कारे देख, नादानी करने को जी चाहता है.. और तबस्सुम….हाय……जैसे चाँद की सोलह कलाएँ….


वो रोशनदान से आता हुआ वह नूर है, जिसके आगे मआशरे के सारे रुआब फीके लगते हैं, अंबर का महताब तनिक मद्धम हो जाता है | ये कुदरत की वो शय है…की जिसकी आँखों के सदके, अपने नसीब के तमाम सवाब, हँस के वार दिए जाएँ |


उसे देख लिया है, अब ऐसा ख़ुशनुमा रह ही क्या जाता है ज़माने में, जिसे देखकर क़यामत के रोज़ भी इत्तवार सा मन हो…अरे, उन आँखों पर तो ऐसे सौ इत्तवार क़ुर्बान |


यूँ न समझा जाए की उनसे मिलने का कोई ग़िला नहीं…
कल शाम ही मुँडेर से लग के खड़ी थी, बड़ी दूर से ही एक झलक दिखी थी बस.. दो से चार घड़ी में ही, साहित्यिक तौर पर बयाँ किया जाए तो, मानो भीतर श्रावन मास की पहली वृष्टि हो उठी…

मगर असमंजस ये है की न जाने क्यूँ, जबसे उन्हें देखा है, तबियत ज़रा भारी सी लग रही है, आँखें बोझिल हैं…

ख़ैर, मयख़ाने तो हम भी गए हैं, और यक़ीन मानें, शराब बिन बात बदनाम है…!!

                                                ~सूर्यान्शी..

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