उम्र के इस दौर में, इस मिट्टी को गौर से निहारने का मौका मिला है…बचपन में तो बस मिट्टी से काल्पनिकता ही बुना करते थे…पर आज जब इतनी समझदारी आई है….तो आँखें तनिक कमज़ोर मालूम पड़ती हैं….उफ्फ़…न जाने बिटिया ने चश्मा कहाँ रख दिया !

उम्र के इस दौर में, इस मिट्टी को गौर से निहारने का मौका मिला है…बचपन में तो बस मिट्टी से काल्पनिकता ही बुना करते थे…पर आज जब इतनी समझदारी आई है….तो आँखें तनिक कमज़ोर मालूम पड़ती हैं….उफ्फ़…न जाने बिटिया ने चश्मा कहाँ रख दिया !

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